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झारखंड :  भारत के सबसे समृद्ध जनजातीय संस्कृतियों के संग्रह में से एक
झारखण्ड की सांस्कृतिक विभिन्नता और आकार के बारे में सपना देखा था जो पीढ़ी दर पीढ़ी समुदायों के द्वारा पूरा किया जा रहा है |

पौराणिक असुर और संथाल, बंजारा, बिहोर, चेरो, गोंड, हो, खोंड, लोहरा, माई पहरिया, मुंडा, ओरांव बत्तीस से अधिक आदिवासी समूहों(राज्य की कुल आबादी का 28 %) ,इस क्षेत्र की संस्कृति पर अपनी छाप छोड़ गए हैं | और उनके साथ संस्कृति के प्रभाव से स्थानीय गैर जनजातीय समुदायों के बाद बौद्ध और जैन धर्म के लोग थे, बंगाल के हिंदू सम्राट मुगल के शासन में थे |

कला इतिहासकारों ने भारत के सबसे पुराने "गुफा चित्रों", " पुस्तक चित्रों " को बनाने वाले को झारखंड में शबर जनजाति के नाम से जाना जाता है ,यह बताया है | जो आज लुप्त होने के कगार पर हैं | यह एक स्थापित तथ्य है कि पाषाण युग के उपकरण की खोज हजारीबाग जिले में और कुल्हाड़ी और भाला का सिरा चाईबासा क्षेत्र में पाए जाते हैं| 10000 से 30000 साल पुराने शैल चित्र,सती पहाड़ियों की गुफाओं में चित्र और अन्य प्राचीन संकेतक, यहाँ तक कि पूर्व ऐतिहासिक, मानव बस्तियों में पाए जाते हैं |

 

 जनजातियाँ
 

 संथाल
झारखण्ड की आदिवासी आबादी में संथाल वर्चस्व रखते हैं | उनकी अद्वितीय विरासत की परंपरा और आश्चर्यजनक परिष्कृत जीवन शैली है और सबसे याद करने वाला उनके लोक संगीत, गीत और नृत्य हैं |  संथाली भाषा व्यापक रूप से है, दान करने की संरचना प्रचुर मात्रा में है | उनकी स्वयं की मान्यता प्राप्त लिपि 'अल्चीकी' है, जो अतुलनीय है और शायद किसी अन्य आदिवासी समुदाय द्वारा कहीं भी नहीं है |
संथाल के सांस्कृतिक शोध दैनिक कार्य में परिलक्षित होते है -- जैसे डिजाइन, निर्माण, रंग संयोजन , और अपने घर की सफाई व्यवस्था में है|दीवारों पर आरेखण, चित्र और अपने आंगन की स्वच्छता कई आधुनिक शहरी घर के लिए शर्म की बात होगी |
संथाल के सहज परिष्कार भी स्पष्ट रूप से उनके परिवार के पैटर्न -- पितृसत्तात्मक,पति पत्नी के साथ मजबूत संबंधों को दर्शाता है| विवाह अनुष्ठानों में पूरा समुदाय आनन्द के साथ भाग लेते हैं | लड़का और लड़की का जन्म आनंद का अवसर हैं | संथाल मृत्यु के शोक अन्त्येष्टि संस्कार को अति गंभीरता से मनाया जाता है | धार्मिक विश्वासों और अभ्यास को हिंदू और ईसाई धर्मों से लेकर माना जाता है |इनमें प्रमुख देवता हैं- 'सिंह बोंगा', 'मोरंग बुरु' और 'जाहेर युग' | पूजा अनुष्ठान में बलिदानों का इस्तेमाल किया जाता है |

सरकार और उद्योग के कई महत्वपूर्ण पदों पर आज संथाल लोगों का कब्जा है |

 

 

 असुर
सबसे प्राचीन जनजातीय समुदायों में से एक है, ये अपने सदियों पुरानी " लोहे के प्रगालन " कौशल के लिए जाने जाते हैं| पुरुष और महिलाएं साथ मिलकर काम करते है, साथ मिलकर खाते हैं, एक साथ वंश की देखभाल करते हैं और रोटी कमाने के लिए संघर्ष करते हैं और अपने परिवार के साथ रहते है | श्रम का विभाजन अद्वितीय है सामाजिक, आर्थिक एकता भी है | तथाकथित आधुनिक समाज को इन लोगों से बहुत कुछ सीखना चाहिए |
 

 


 बंजारा
यह एक और समूह है जिनकी संख्या तेजी से घट रही है | उनके गाँव पहाड़ियों और जंगलों के निकट स्थित है |वे कुशल बुनकर हैं और मैट, टोकरियाँ, ट्रे आदि जंगल के जंगली घास से बनते है |  वे बच्चे के जन्म पर गांवों के आसपास प्रार्थना गाने के लिए भी जाते है| ये झारखंड में सबसे 'छोटी' आदिवासी आबादी है |

 

 महली
बंसफोर महली टोकरी बनाने के विशेषज्ञ हैं, पतर महली टोकरी बनाने के उद्योग से जुड़े हैं और सुलुन्खी महली श्रम की खेती पर जीवित है, तांती महली पारंपरिक 'पालकी' के पदाधिकारी हैं और मुंडा महली किसान है | आमतौर पर महली वंश, जनजाति और कबीले के साथ उत्कृष्ट संबंध बनाए रखते हैं |

 

बिरहोर
यह एक खानाबदोश जनजाति है जो उनके फायटोप्लेकटन क्षमताओं के लिए जाने जाते है |ये उच्च पहाड़ी चोटियों या जंगलों के बाहरी इलाके में वास करते हैं |जो अस्थायी झोपडियों में समूहों में वास करते हैं और लच्छीवाला परिवार के जीवन का आनंद ले रहे हैं जगही बिरहोर के नाम से जाना जाता है और कलाइयों समूहों को ऊथेइअन बिरहोर कहा जाता है |

 
 

 चिकबरैक
यह स्पिनर और बुनकरों के समुदाय के रूप में, चिकबरैक गांवों में अन्य जातियों और जनजातियों के साथ रहते हैं | इस तरह से महिलाऐं स्वयं आभूषण के साथ रहती है | परिवार मजबूत हैं और श्रम विभाजन उम्र के अनुसार किया जाता है |

 

 बिरजिया  बैगास
ये छोटी अनुसूचित जनजातियाँ अभी भी वन संसाधनों पर निर्भर है |ये गहरे जंगल और दुर्गम कृषि क्षेत्रों में रहते हैं | हाल के दिनों में उन्होंने खेती को त्याग दिया है |बिगास की खोज 1867 में 'जंगली' के रूप में और दूरदराज के दुर्गम पहाड़ियों के वन क्षेत्रों में रहने वाले के रूप में हुई थी |

     

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